30 June 2015

कछुए की अँगूठी का रहस्य


मित्रों मेरा पिछला आर्टिकल "कछुए की अँगूठी का रहस्य"

     इस लेख सम्बन्धी मुझसे कुछ लोगों ने प्रश्न किया कि सर हमने कुछ समय पहले कछुए की अंगूठी धारण की थी, पर उसके बाद मन अशांत और चिड़चिड़ा रहने लगा और इसके चलते अँगूठी उतार दी।  और ऐसे में आपका विज्ञान और उसका सिद्धांत कि कछुए की अंगूठी धारण करने से सम्रद्धि आती हैं, वह धरा का धरा रह गया। ऐसा क्यों ?

     मित्रों कछुए की अँगूठी धारण कराने के पीछे हमारा एक मात्र प्रयोजन होता हैं कि व्यक्ति के "ध्यान" की दिशा को कछुए से सम्बंधित धारणाओं व गुणों इत्यादि से जोड़ना। यानी व्यक्ति के स्वभाव में कछुए के स्वभाव जैसे गुणों को विकसित करना।

     मित्रों अंगूठी धारण करने के बाद जैसे-जैसे हमारा जुड़ाव इस अँगूठी के साथ बढ़ता रहता हैं वैसे-वैसे स्वभाव में परिवर्तन होना शुरू हो जाता हैं। और ऐसे में उन लोगों को इससे प्रारम्भ में कुछ तकलीफ महसूस होने लगती हैं, जिनका स्वभाव कछुए के स्वभाव से विपरीत यानी उद्दण्ड, फुर्तीला या खरगोश के स्वभाव जैसा होता हैं। मित्रों निसन्देह स्वभाव में अचानक आने वाले इस परिवर्तन के कारण किसी-किसी को कुछ चिड़चिड़ापन जरूर आ सकता हैं।

     पर 90 दिनों तक जब निरन्तर हम इस अँगूठी के संपर्क में रहते हैं तो कछुए का गुण-स्वभाव हमारे सबकोंसियश मस्तिष्क में प्रोग्राम हो जाता हैं। जैसे कंप्यूटर में जब नया वर्जन आ जाता हैं तब कुछ दिनों तक अजीब सा लगता हैं ना, ठीक वैसे ही जब स्वभावगत परिवर्तन आते हैं तब थोडा अजीब सा महसूस होता हैं। और ऐसे में हम ये समझ कर अँगूठी निकाल देते हैं और बोलते हैं कि अँगूठी सूट नही हुई।

     मित्रों रत्न-धारण और कछुए की अंगूठी धारण करने के मूल में एक ही प्रयोजन हैं, भावों का परिवर्तन। क्योंकि भाव से स्वभाव बनता हैं, और स्वभाव के प्रभाव से कर्म संपन्न होता हैं, जिसके द्वारा हम फल तक की यात्रा करते हैं। इसलिए मित्रों अच्छा भाव होगा, तो अच्छा ही स्वभाव होगा, और स्वभाव अच्छा हुआ तो उसका प्रभाव और फल भी अच्छा ही होगा।

     भाव-स्वभाव-प्रभाव-क्रिया-कर्म-फल...(कर्म-सिद्धांत)

     मित्रों कछुए की अँगूठी धारण करने से सम्रद्धि आती हैं ऐसा मैंने सुना था। पर जब तक स्वयं किसी तर्क पर न पहुँच जाऊँ तब तक में उस बात को नही मानता, ये मेरा स्वभाव हैं। किसी भी उपाय के विज्ञान को समझे बिना उसका उपयोग करना मात्र मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं। शोध किसी की भी हो, पर उस पर अपना अनुभव एक मजबूत आत्मविश्वास पैदा करता हैं।


        Astrologer & Philopher
            Gopal Arora
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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25 June 2015

क्यों सात बार राई वारने से उतर जाती हैं नजर


क्यों सात बार राई वारने से उतर जाती हैं नजर ?

     मित्रों अक्सर हम सुनते है कि जब किसी को नजर लग जाती है तो उसे कहते हैं कि अपनी मुट्ठी में राई लेकर अपने सिर से सात बार वार कर फेंक दो। क्या राई को सात बार वार देने क्या नजर उतर सकती हैं ? आइये इसके पीछे क्या विज्ञान काम करता हैं समझने का प्रयास करते हैं।

     मित्रों अक्सर आप देखते होंगे की राई को जब किसी प्लास्टिक बेग से निकालते हैं तो राई उस प्लाष्टिक बेग से चिपक जाती हैं। वो उसके चुम्बकीय गन के कारण होता हैं। हालाँकि संसार की सभी चीजों में अपना एक चुम्बकीय गुण होता हैं पर राई में घर्षण से उसका चुम्बकीय गुण जल्दी सक्रिय हो जाता हैं जिसके चलते ये जल्दी ही किसी के औरा के संपर्क में आकर उसके नकारत्मक फिल्ड को अवशोषित कर लेती हैं।

     जब राई को सात बार हमारे शरीर पर से वारा जाता हैं तब इसका संपर्क हमारे शरीर के आभामंडल से होता हैं, जिसे हम सुरक्षा चक्र भी कहते हैं। राई के लगातार हमारे आभामंडल से टकराने से इसका चुम्बकीय गुण सक्रीय होकर हमारे शरीर के सातों चक्रों में फैली नकारात्मकता को सोख लेता हैं। सात बार वारने का मतलब हमारे सूक्ष्म शरीर के सातों चक्रों का शुद्धिकरण करना होता हैं। सात बार राई को वारने के बाद उसे घर से कुछ दूर नाली में फेंक दिया जाता हैं या जलाकर नष्ट कर दिया जाता हैं।

     मित्रों वैसे आभामंडल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इसके लिए साधारण तौर पर इतना बता देता हूँ कि आभामंडल हमारे शरीर का सुरक्षा चक्र होता हैं। जब ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अच्छी-बुरी दशा चलती हैं तो उसका सबसे पहला प्रभाव हमारे आभामंडल पर ही पड़ता हैं। पर अगर हम किसी अच्छी संगत, अच्छे विचार या किसी ज्ञानी गुरु के संपर्क में हो या किसी भगवान् में हमारी आस्था बहुत मजबूत हो तो ग्रहों के बुरे प्रभाव की रश्मियाँ हमारे उस आभामंडल यानी सुरक्षा चक्र का भेदन करने में कामयाब नही होती। इसलिए जो लोग निरंतर सत्संग करते हैं, सकारात्मक विचारों के संपर्क में रहते हैं ऐसे पुण्यशाली लोगों पर ग्रहों, टोने-टोटके और नजर इत्यादि का बुरा प्रभाव आसानी से नही पड़ता। और न ही कोई नकारात्मकता उनके आभामंडल को भेद पाती हैं।

     मित्रों ऐसे कई सारे टोटके इत्यादि है जिन्हें हम अंधविश्वास का नाम देकर नजर अंदाज कर देते हैं। क्योंकि हमें इनके गर्भ में छूपे सिद्धांत का पता नहीं होता।

(वैसे मित्रों कलयुग के चलते सदियों से चलती परम्पराओं के साथ आजकल कुछ बेतुके अंधविश्वासों का जन्म भी हो गया हैं जिनसे हमें सावधान रहने की जरुरत हैं। बिना वैज्ञानिक अर्थ के किसी बात को मान लेना मात्र मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं)


       Astrologer & Philopher
            Gopal Arora
 









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20 June 2015

Electro magnetic field


     दोस्तों जिसे हम लोग आम भाषा में आत्मा, भूत या देव ईत्यादि नामों से जानते हैं वास्तव में वो एक "electro magnetic filed" है, यानी विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र हैं। और इस चुम्बकीय क्षेत्र में हमारे जन्म-जन्मांतरों के डेटा "चुम्बकीय तरंगो" के रूप में रक्षित होते हैं।

     दोस्तों कम्प्यूटर, सी डी या हार्ड डिस्क इत्यादि में रक्षित सभी डेटा मूल रूप में "electro magnetic filed" के रूप में ही रक्षित होते हैं। और सीडी या हार्ड डिस्क ईत्यादी घटक तो मात्र इन चुम्बकीय तरंगो को सुरक्षित रखने का साधन मात्र होते हैं। बाकी ये सभी डेटा कम्प्यूटर ईत्यादि के माध्यम से "चुम्बकीय तरंगो" के रूप में ब्रम्हांड में ही रक्षित होते हैं। बिना कम्प्यूटर इत्यादि के सहयोग के बिना इनका निर्माण नही हो सकता।

     बिल्कुल ठीक ऐसे ही हमारी आत्मा रुपी ऊर्जा के कण पर जन्म-जन्मान्तर के हमारे विचारों, भावों और कर्मो के डेटा रिकॉर्ड होते हैं। जब हम जन्म लेते हैं तब आत्मा के साथ ये रिकॉर्डेड डेटा शरीर के विकास के साथ न्यूरोन्स द्वारा रीड होकर शरीर रूपी कम्प्यूटर के साथ रन होने लगते हैं। जन्म-जन्मांतरों से रक्षित ये डेटा एक प्रोग्राम के रूप में हमारे स्वभाव के साथ सक्रीय हो जाते हैं। और उन्हीं रिकॉर्डेड प्रोग्राम के चलते हमारा स्वभाव चुनाव प्रक्रिया द्वारा कर्मो का चुनाव कर अच्छे-बुरे परिणामों की यात्रा करता हैं। और इसके साथ-साथ हमारा कम्युटर सिस्टम इस जन्म के भावों, विचारों और कर्मो को निरंतर अपनी मैमोरी में "electro magnetic filed"  के रूप में निरंतर रिकॉर्ड करता रहता हैं। 

     एक बात ध्यान रखे की जैसे हार्ड डिस्क ईत्यादि में डेटा को रक्षित करने के लिये कंप्यूटर इत्यादि घटक की आवश्यकता होती हैं ठीक वैसे ही हमारी आत्मा पर रक्षित ये डेटा भी बिना शरीर के ना तो रिकॉर्ड हो सकते हैं और ना ही रन हो सकते हैं। इसलिए अक्सर हम कथाओं में सुनते हैं की देवता लोग भी ये मनुष्य शरीर पाने हेतू लालायित रहते हैं। क्योकि बिना शरीर के देवता भी कुछ नही कर सकते और ना ही प्रेत कुछ कर सकते हैं।

     अक्सर हम जब किसी शरीर में देव या प्रेत ईत्यादि की उपस्थिति देखते हैं तब व्यक्ति के शरीर की हरकते बदल जाती हैं। उसकी आवाज इत्यादि भी बदल जाती हैं। मित्रों आत्मा, प्रेत या देव ईत्यादि के "electro magnetic filed" किसी शरीर में प्रवेश नही करते बल्कि हमारे मस्तिष्क के न्यूरोन्स इनके द्वारा भेजे गये चुम्बकीय सन्देशों को रीड कर प्रतिक्रिया शुरू कर देते हैं। जैसे एक सीडी में लतामंगेशकर के गाने हैं तो क्या सीडी पड़े-पड़े बोल उठेगी ? नही ना... उसके लिए हमे कम्प्यूटर या सीडी प्लेयर ईत्यादि की जरुरत होगी। सीडी में रक्षित डेटा का सम्पर्क कम्प्यूटर ईत्यादि से होने पर ही लता मंगेशकर की आवाज में गाने बजने शुरू होंगे। बस ठीक इसी तरह हमारे मष्तिष्क के न्यूरोन्स ऐसे ही किसी Magnetic Field ke संपर्क में आने पर वैसी ही प्रतिक्रिया देंगे।

     दोस्तों सारा का सारा संसार इन्ही तरंगो के रहस्यों से भरा पड़ा हैं। जो मैंने आपको बताया हैं वैसा आपने कही नही पढ़ा होगा। क्योंकि ये शोध बिलकुल नई हैं जिस पर विशवास कर मान लेना अभी फिलहाल नामुनकिन हैं। पर मित्रों इन पर बहुत शोध चल रहा हैं और आने वाले सौं वर्षों में इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ी क्रांति देखी जा सकती हैं। आजतक हम जो सुन रहे हैं और पढ़ रहे हैं वो  धर्म और धार्मिक ग्रंथों की सीमा के दायरे में सिमित हैं। पर इस फिलोसोफी तक पहुँचने के लिए आपको धर्म की सीमाओं से ऊपर उठना होगा।
लिखने को और बताने को बहुत कुछ हैं पर समय का अभाव हैं दोस्तों। जब भी समय मिलेगा तब इस विषय पर और चर्चा करेंगे।

     मेरे विचार और सोच लीक से हटकर हैं। और मैं जानता हूँ की वर्तमान परिपेक्ष में इन तथ्यों को स्वीकारा जाना नामुनकिन हैं। क्योकि भविष्य की बातों को वर्तमान में स्वीकार करना कठिन हैं। ये विचार मेरे स्वतंत्र विचार हैं, मैं किसी पर अपने विचार थोप नही रहा हूँ। किसी को इसमें रूचि हैं तो स्वयं शोध करें। ध्यान के माध्यम से ब्रम्हांड की इन सूक्ष्मताओं से संपर्क किया जा सकता हैं। ध्यान के सहारे जब आप की ऊर्जा सहस्त्रार तक पहुँचती हैं तो आपके मष्तिष्क में चींटिया सी रेंगने लगती हैं। विज्ञान की भाषा में आपके न्यूरोन्स को अत्यधिक ऊर्जा मिलती हैं जिसके चलते आपके न्यूरोन्स की सेन्सेटिविटी बढ़ जाती हैं। और इसी के चलते आपकी चुंबकीय तरंगे ब्रम्हाण्डीय रहस्यों को खोजने में कामयाब हो जाती हैं।

              Astrologer & Philopher
                    Gopal Arora
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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13 May 2015

आखिर क्या रहस्य छुपा हैं कछुए की आकृति वाली अँगूठी में


मित्रों आजकल अधिकतर लोगों को कछुऐ की आकृति वाली अँगूठी धारण किये हुए देखा जाता हैं।

      पर क्या कछुऐ की अँगूठी वास्तव में सम्रद्धि लाती हैं ?

      क्या इसके धारण करने से जीवन में खुशहाली आती हैं ?

      आइये इसके पीछे क्या सिद्धांत काम कर रहा हैं उसको समझते हैं।

     मित्रों आपने अक्सर मेरे लेख पढ़े होंगे। मैं हमेशा एक ही बात पर जोर देता हूँ कि, जीवन के इस सफर में आज हम जहाँ पर भी खड़े हैं, और जैसी भी स्तथि में हैं, उसका मूल कारण हमारा "ध्यान" हैं। मन ऊर्जावान हैं और इसका ध्यान जिस और होता हैं ऊर्जा का प्रवाह भी उस और बहने लगता हैं। और हमारे मन के भावों की ऊर्जा ध्यान के माध्यम से जिस और बहती हैं, हम उसी को प्राप्त होते हैं या उस लक्ष्य को पाते हैं।

    बस मित्रों कछुऐ की आकृति वाली अँगूठी पहनने के पीछे भी यही "ध्यान" वाला सिद्धांत ही काम कर रहा हैं।
अँगूठी को धारण करने के बाद जब-जब हमारा "ध्यान" इसकी और जाता हैं तब कछुए के साथ जुडी धारणाएँ हमारे मानसिक पटल पर फ्लेश होती हैं। यह क्रिया स्वतः ही संपन्न होती हैं। मित्रों जब भी किसी वस्तु चित्र इत्यादि की तरफ हमारा ध्यान जाता हैं तब तत्काल उससे सम्बंधित धारणाएँ हमारे मानसिक पटल पर प्रकट हो जाती हैं। पूजा-पाठ इत्यादि के पीछे भी यही प्रयोजन हैं कि हम इनके माध्यम से ईश्वर से जुड़े रहे।

     मित्रों कछुआ धैर्य, शांति, निरन्तरता (Continuity), लक्ष्य और सम्रद्धि का प्रतिक हैं।  कछुए और खरगोश की कहानी तो सभी जानते हैं कि कैसे कछुए ने Continuity रखते हुए अपने लक्ष्य को हासिल किया। और कछुआ लक्ष्मी जी का प्रिय भी हैं। क्योकि लक्ष्मी जी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थी, इसलिए समुद्र से निकलने वाले सभी जीव मछली, कौड़ी, शिप, कछुआ इत्यादि सभी लक्ष्मी जी के मित्र माने जाते हैं।

     मित्रों कछुए को देखते ही उससे जुड़ी सारी धारणाओं की तरफ हमारा "ध्यान" चला ही जाता हैं, और इसी के चलते हमारे ध्यान की ऊर्जा का प्रवाह उस और हो जाता हैं, जिसके चलते हम धैर्य और शांत स्वभाव को रखते हुए समय पर लक्ष्य का भेदन कर सम्रद्धि को प्राप्त करते हैं।

     मित्रों यहाँ में एक बात और कहना चाहूँगा कि कछुए की आकृति वाली अँगूठी अगर किसी बच्चे को पहना दी जाये या किसी ऐसे व्यक्ति को पहना दी जाये जिसे कछुए से जुड़ी इन धारणाओं का ज्ञान नही, तो उसके लिए ये अँगूठी मात्र एक आभूषण साबित होगी। उसे इसका कोई लाभ प्राप्त नही होगा। क्योंकि उसके मन की ऊर्जा का प्रवाह इस और नही होगा।

     मित्रों हमारे धर्म की सभी परम्पराओं के पीछे भी यही सिद्धांत काम करता हैं। इन सभी परम्पराओं से जुड़ी कथा-कहानियों के माध्यम से हमारे "ध्यान" की दिशा को एक सकारात्मक विचार से जोड़ दिया जाता हैं। इसलिए कहते हैं "दिशा बदलो, दशा तो अपने-आप बदल जायेगी"। यहाँ दिशा बदलने का मतलब विचारों की दिशा बदलने से हैं।

     मित्रों हमारे ऋषि-मुनियों को पता था कि इंसान इस रहस्य की गहराई को समझ नही पायेगा, इसलिये उन्ही सिद्धांतों को परम्पराओं का अमलीजामा पहना कर हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया। और हर परम्परा के द्वारा हमारे ध्यान को एक सकारात्मक विचार से जोड़ दिया।

     मित्रों अपने गहन शोध के बाद मैंने जब इस "सिद्धांत" को समझा तो मैं हैरान रह गया कि हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषी-मुनियों और दार्शनिकों का चिंतन कितना गहरा रहा होगा, जिन्होंने इस सिद्धांत को समझकर अनेक ग्रंथो और परम्पराओं की रचनाएँ कर डाली।


     Astrologer & Philopher
            Gopal Arora









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12 May 2015

मंत्र जाप में अशुद्ध उच्चारण का प्रभाव


     मित्रों कई बार मानव अपने जीवन में आ रहे दुःख ओर संकटो से मुक्ति पाने के लिये किसी विशेष मन्त्र का जाप करता है, लेकिन मन्त्र का बिल्कुल शुद्ध उच्चारण करना एक आम व्यक्ति के लिये संभव नहीं है ।
अक्सर हम जैसे लोग ही कहा करते है कि देवता भक्त का भाव देखते है वो शुद्धि अशुद्धि पर ध्यान नही देते है, पर हमारा ऐसा कहना एक हद तक ठीक है।

     आइये मित्रों कर्म सिद्धांत के इस नियम को समझने का प्रयास करते हैं।
मित्रों शास्त्रों में लिखा हैं। 

मूर्खो वदति विष्णाय, ज्ञानी वदति विष्णवे ।
द्वयोरेव संमं पुण्यं, भावग्राही जनार्दनः ।।

अर्थात -
मूर्ख व्यक्ति "" ऊँ विष्णाय नमः"" बोलेगा।
ज्ञानी व्यक्ति "" ऊँ विष्णवे नमः"" बोलेगा।

     मित्रों यहाँ इस मन्त्र में सिर्फ एक मात्रा के गलत प्रयोग (विष्णाय=विष) से अर्थ का अनर्थ हो गया। फिर भी मित्रों इन दोनों उच्चारणों का पुण्य समान ही मिलेगा, क्योंकि भगवान केवल भावों को ग्रहण करने वाले है। और जब कोई भक्त भगवान को निष्काम भाव से, बिना किसी स्वार्थ के याद करता है तब भगवान भक्त कि क्रिया ओर मन्त्र कि शुद्धि-अशुद्धि के ऊपर ध्यान नही देते है बल्कि वो तो केवल भक्त का भाव देखते है।
     पर मित्रों जब कोई व्यक्ति किसी विशेष मनोरथ को पूर्ण करने के लिये किसी मन्त्र का जाप या स्तोत्र का पाठ करता है तब सम्बन्धित देवता उस व्यक्ति कि छोटी से छोटी क्रिया ओर अशुद्ध उच्चारण पर ध्यान देते है। और जैसा वो जाप या पाठ करता है वैसा ही उसको फल प्राप्त होता है।

आइये इसी सन्दर्भ में एक व्रतांत बताता हूँ।

     एक बार एक व्यक्ति कि पत्नी बीमार थी। वो व्यक्ति पंडित जी के पास गया ओर पत्नी कि बीमारी कि समस्या बताई। पंडित जी ने उस व्यक्ति को एक मन्त्र जप करने के लिये दिया ।

      मन्त्र था  ""भार्यां रक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी कि रक्षा करो। अब वो व्यक्ति मन्त्र लेकर घर आ गया। ओर पंडित जी के बताये मुहुर्त में जाप करने बैठ गया..    अब जब वो जाप करने लगा तो " रक्षतु" कि जगह " भक्षतु" जाप करने लगा। वो सही मन्त्र को भूल गया । " भार्यां भक्षतु भैरवी" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी को खा जाओ । "" भक्षण"" का अर्थ खा जाना है। अभी उसे जाप करते हुये कुछ ही समय बीता था कि बच्चो ने आकर रोते हुये बताया.. पिताजी माँ मर गई है। ऐसे में उस व्यक्ति को दुःख हुआ... साथ ही पण्डित जी पर क्रोध भी आया.. कि पंडित ने ये कैसा मन्त्र दे दिया।

     कुछ दिन बाद वो व्यक्ति पण्डित जी से जाकर मिला ओर कहा कि आपके दिये हुये मन्त्र को में जप ही रहा था कि थोडी देर बाद मेरी पत्नी मर गई... पण्डित जी ने कहा.. आप मन्त्र बोलकर बताओ.. कैसे जाप किया आपने... वो व्यक्ति बोला:- "" भार्यां भक्षतु भैरवी""  पण्डित जी बोले:- तुम्हारी पत्नी मरेगी नही तो और क्या होगा। एक तो पहले ही वह मरणासन्न स्थिति में थी.. और रही सही कसर तुमने " रक्षतु" कि जगह "" भक्षतु!" जप करके पूरी कर दी.. भक्षतु का अर्थ है !" खा जाओ... मन्त्र तुमने गलत जपा और अब दोष मुझे दे रहे हो।
तब उस व्यक्ति को अपनी गलती का अहसास हुआ.. तथा उसने पण्डित जी से क्षमा माँगी ।

     मित्रों इस लेख का सार यही है कि जब भी आप किसी मन्त्र का जाप अपने किसी विशेष मनोरथ को पूर्ण करने के लिये करे तब क्रिया ओर मन्त्र शुद्धि पर पूरा ध्यान दे। अशुद्ध पढने पर मन्त्र का अनर्थ हो जायेगा... ओर मन्त्र का अनर्थ होने पर आपके जीवन में भी अनर्थ होने कि संभावना बन जायेगी। इसलिये मित्रों अगर किसी मन्त्र का शुद्ध उच्चारण आपसे नहीं हो रहा है.. तो बेहतर यही रहेगा.. कि आप उस मन्त्र के साथ छेडछाड नहीं करे, बल्कि योग्य पंडित द्वारा ही जाप करवायें।



     Astrologer & Philosopher
           Gopal Arora
                                                                                   






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22 April 2015

इन चार उपायों से बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित करें


यहाँ चार तरीक़े दिए जा रहे है, जिनकी मदत से आप बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित कर सकते है। 

     1. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बड़े, सकारात्मक, आशावादी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें।  जब कोई आपसे पूछता है, "आप आज कैसा महसूस कर रहे है?" और आप उसे जवाब देते है, "मै थका हुआ हुँ ( मुझे सिरदर्द है, काश कि आज शनिवार होता, मेरा आज बहुत बुरा हाल है )" तो आप अपनी स्थिति को अपने ही हाथों ख़राब कर रहे है।  इसका अभ्यास करें :- यह एक बहुत आसान बात है, परंतु इसमें बहुत शक्ति है।  जब भी कोई आपसे पूछे, "आप कैसे है ?" या "आप आज कैसा महसूस कर रहे है ?" तो जवाब में हमेशा कहें, "बहुत बढ़िया! धन्यवाद और आप कैसे है ?"  या कहे "बेहतरीन" या "शानदार"।  हर मौक़े पर कहें कि आप बढ़िया महसूस कर रहे है और आप सचमुच बढ़िया महसूस करने लगेंगे और ज्यादा बड़ा भी।  एक ऐसे व्यक्ति बनें जो हमेशा बढ़िया महसूस करता है।  इससे दोस्त बनते है। 

     2. दूसरे लोगों का वर्णन करते समय चमकीले, खुशनुमा, सकारात्मक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें।  यह नियम बना लें कि आप अपने सभी दोस्तों और सहयोगियों के लिए बड़े, सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करेंगे।  जब आप किसी के साथ किसी तीसरे अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हो, तो आप उसकी बड़े शब्दों में प्रशंसा करे, "हाँ, वह बढ़िया आदमी है।"  "लोग कहते है उसका काम बहुत बढ़िया है।"  इस बात का बहुत ध्यान रखें कि आप उसकी बुराई न करें या घटिया भाषा का इस्तेमाल न करें।  देर सबेर तीसरे व्यक्ति को पता चल जाता है कि आपने क्या कहा था, और आपने जो बुराई की थी, वह आपको ही बुरा बना सकती है। 

     3. दूसरों का उत्साह बढ़ाने के लिए सकारात्मक भाषा का प्रयोग करें।  हर मौक़े पर लोगों की तारीफ़ करें।  अपनी पत्नी या पति की हर रोज़ तारीफ़ करें।  अपने साथ काम करने वालों की रोज़ तारीफ़ करें।  अगर सच्ची तारीफ़ की जाए, तो यह सफ़लता का औज़ार बन जाती है।  इसका प्रयोग करे! इसका प्रयोग बार-बार, हर बात करें।  लोगों के हुलिए, उनके काम, उनकी उपलब्धियों, उनके परिवार की तारीफ़ करें। 

     4. दूसरों के सामने योजना प्रस्तुत करते समय सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें।  जब लोग इस तरह की बात सुनते है - "मै आपको एक अच्छी खबर सुनाना चाहता हुँ।  हमारे सामने एक सुनहरा अवसर है..." तो उनके दिमाग़ में आशा जाग जाती है।  परंतु जब वे इस तरह की कोई बात सुनते है, "चाहे आप इसे पसंद करें या न करें, हमें यह काम करना है,"  तो दिमाग़ की बोझिल, बोअरिंग हो जाती वे भी इसी तरह के हो जाते है।  जीत का वादा करें और उनकी आँखों में चमक आ जाएगी।  जीत का वादा करें और आपको समर्थन हासिल हो जाएगा।  महल बनाएं, क़ब्र न खोदें!  

15 April 2015

अपने सच्चे आकार को नापें और जानें कि आप कितने योग्य है


     अब अगर इतने सरे लोगों की सोंच इतनी छोटी है, तो इसका मतलब यह हुआ कि अगर आप सचमुच बड़ा सोचते है तो आपके सामने बहुत कम प्रतियोगिता है और आपके लिए एक बहुत बड़े करियर का रास्ता खुला है। 

     सफलता के मामले में लोगों को इंच या पौंड के हिसाब से नही नापा जाता, न ही उन्हें कॉलेज की डिग्री यों से या पारिवारिक पृष्ठ भूमि के पैमाने से नापा जाता है, उन्हें तो उनकी सोच के आकार से नापा जाता है।  आप कितना बड़ा सोंचते है, यही आपकी उपलब्धियों के आकार को तय करता है।  देखते है कि हम किस तरह अपनी सोच को बड़ा कर सकते है। 

     कभी आपने खुद से पूछकर देखा है, "मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है ?"  शायद इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी खुद का मूल्यांकन कम करने की होती है - यानि की खुद को सस्ते में बेचने की कमजोरी।  आत्म-मूल्यांकन में कमी अनगिनत तरीकों से साफ़ दिखती है।  जॉन अख़बार में एक नौकरी का विज्ञापन देखता है।  वह इसी तरह की नौकरी करना चाहता है।  परंतु वह इसके लिए कोई कोशिश नही करता क्योंकि वह सोचता है, "मै इस नौकरी के लिए पर्याप्त योग्य नहीं हूँ, इसलिए कोशिश करने की मेहनत क्यों करुँ ?"  या जिम जोन के साथ डेटिंग पर जाना चाहता है, परंतु वह उससे नहीं पूछता क्योंकि उसे लगता है कि वह तैयार नही होगी। 

     टॉम को लगता है कि मिस्टर रिचर्ड्स उसके माल के अच्छे ग्राहक हो सकते है, परंतु टॉम मिस्टर रिचर्ड्स जैसे बड़े आदमी उससे नहीं मिलेंगे।  पीट नौकरी का आवेदन भर रहा है।  उसमे एक प्रशन पूछा जाता है, "आप शुरुवात में कितनी तनख़्वाह चाहेंगे?"  पीट एक छोटी-सी रक़म लिख देता है क्योंकि उसे लगता है कि वह इससे ज्यादा तनख़्वाह के योग्य नही है, जबकि वह इससे ज्यादा तनख़्वाह पाना चाहता है। 

     हज़ारों सालों से दार्शनिक हम यह अच्छी सलाह देते आ रहे है - खुद को जाने।  परंतु ज्यादातर लोग इस सलाह का मतलब यह निकालते है कि खुद को नकारात्मक पहलू को जाने।  ज्यादातर आत्म-मूल्यांकनों में लोग अपनी गलतियों, कमियों, अयोग्यताओं की लंबी सी मानसिक सूची बना लेते है। 

     हमें अपनी कमियाँ पता हो, अच्छी बात है।  इनसे हमें यह पता चलता है कि हमें इन क्षेत्र में सुधार करना है।  परंतु अगर हम सिर्फ़ अपने नकारात्मक पहलू को ही जान पाए तो हम परेशानी में फँस जाएँगे।  हमारा मूल्य अपनी नज़रों में कम हो जाएगा। 

     यह एक अभ्यास दिया गया है जिससे आप अपने सच्चे आकार को नाप सकते है।  मैंने इसे एक्जीक्यूटिव्ज और सेल्स पर्सनल्स के अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आज़ माया है।  यह वाक़ई काम करता है। 

     1. अपने पाँच प्रमुख गुणों को तय करें।  किसी निष्पक्ष दोस्त की मदत लें - जैसे आपकी पत्नी, आपका सीनियर, आपका प्रोफ़ेसर - कोई समझदार व्यक्ति जो आपको सच्ची राय दे सके।  ( गुणों के उदाहरण है शिक्षा, अनुभव, तकनीकी योग्यता, हुलिया, संतुलन घरेलू जीवन, रवैया, व्यक्तित्व, लीडरशिप की योग्यता )।

     2. हर गुण के सामने अपने उन तीन परिचित व्यक्तियों के नाम लिख लें हो बेहद सफ़ल है परंतु उनमें यह गुण उतनी मात्र में नही है, जितनी मात्र में यह आपमें है।
     इस अभ्यास को पूरा कर लेने पर आप पाएँगे कि आप किसी न किसी बात में कई सफ़ल लोगों से आगे है।

     ईमानदारी से आप एक ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते है - आप जितना सोचते है, आप उससे बड़े है।  इसलिए, आप अपनी सोच को भी अपने साली आकार के हिसाब से बना लें।  उतना ही बड़ा सोचें जितने बड़े आप है! और कभी, खुद को सस्ते में न बेचें!

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11 April 2015

विशवासपूर्ण काम करके विशवासपूर्ण सोंच विकसित करें


      यहाँ एक मनो वैज्ञानिक सिद्धांत दिया जा रहा है जो 25 बार पढ़ने लायक है।  इसे तब तक पढ़ते रहे, जब तक कि यह आपके दिमाग़ में पूरी तरह से न घुस जाए :- विशवास पूर्ण चिंतन के लिए विशवास पूर्ण काम करें। 

     महान वैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज. क्रेन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अप्लाइड साइकलॉजी ( शिकागो :- हॉप किन्स सिंडिकेट, इन्क 1950 )  में लिखा है, "याद रखें, काम ही भावनाओं के अग्रज होते है।  हम अपनी भावनाओं को तो सीधे नियंत्रित नहीं कर सकते।  परंतु हम अपने कामों को नियंत्रित करके अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकते है।  वैवाहिक समस्याओं और ग़लत फहमियो को दूर करने के लिए सच्चे मनो वैज्ञानिक तथ्यों को जानें।  हर दिन सही काम करें और जल्दी ही आप में सही भावनाएँ जाग जाएगी!

     मनो वैज्ञानिक के अनुसार शारीरिक गतिविधियों में बदलाव करके हम अपने रवैए को बदल सकते है।  उदाहरण के तौर पर, आप अगर मुस्कराने की क्रिया करते है, तो आप सचमुच मुस्कराने के मूड में आ जाएंगे।  जब आप अपने शरीर को झुकाने के बजाय तान लेते है तो आप ज्यादा सुपीरियर महसूस करने लगते है।  इसके उलट अगर, त्यौरियां चढ़ाकर देखें तो पाएँगे कि आप त्यौरियां चढ़ाने के मूड़ में आ गए है। 

     यह सिद्ध करना तो आसान है कि अपनी क्रियाओं पर काबू करके आप अपनी भावनाओं को बदल सकते है।  जो लोग अपना परिचय देने में संकोच करते है, वे अपने संकोच को आत्म विशवास में बदल सकते है अगर वे सिर्फ कुछ सामान्य क्रियाएँ करे - पहली बात तो यह कि सामने वाले से गर्मजोशी से हाथ मिलाए।  इसके बाद, सामने वाले व्यक्ति की तरफ एकल सीधे देखें।  और तीसरी बात, सामने वाले से कहें, "मुझे आपसे मिलकर ख़ुशी हुई।"

     इन तीन साधारण क्रियाओं से आपका संकोच अपने आप और तत्काल दूर हो जाएगा।  आत्म विशवास से भरी क्रिया की वजह से आप में अपने आप आत्म विशवास आ जाएगा। 

     आत्मविशवासपूर्ण चिंतन करने के लिए आत्मविशवास की क्रियाएँ करें।  जिस तरह की भावनाएँ आप स्वयं में जगाना चाहते है, उस तरह के काम करें।  नीचे आत्मविशवास बढ़ाने के लिए पॉँच अभ्यास दिए है।  इन्हें ध्यान से पढ़े।  फिर इनका अभ्यास करने की पूरी कोशिश करें और आप अपना आत्मविशवास काफ़ी बढ़ा-चढ़ा पाएँगे। 

     1. आगे की बेंच पर बैठे।  कभी आपने मीटिंग या चर्च या क्लास रूम या किसी और तरह की सभा में इस बात पर गौर किया की पीछे की सीटें सबसे पहले भर जाती है ? ज्यादातर लोग पीछे की लाइन में इसलिए बैठते है ताकि वे "लोगों की नज़रों में न आए"।  और वे लोगों की नज़रों में आने से इसलिए बचना चाहते है क्योंकि उनमें आत्मविशवास नहीं आता। 

     2. नज़रें मिलाकर बात करने का अभ्यास करें।  कोई व्यक्ति किस तरह अपनी आँखों का प्रयोग करता है, इससे भी हमें उसके बारे में काफ़ी जानकारी मिल सकती है।  अगर कोई आपकी आँखों में सीधे नहीं देखता है, तो आपके मन में यह सवाल तत्काल आ जाता है, "यह व्यक्ति क्या छुपाने की कोशिश कर रहा है ? यह व्यक्ति किस बात से डरा हुआ है ? क्या यह मुझे धोका देना चाहता है ? इस व्यक्ति के इरादे क्या है ?"

     3. 25% तेज़ चले।  आत्मविशवास बढ़ाने के लिए 25% तेज़ चलने की तकनीक का प्रयोग करके देखें।  अपने कंधो को सीधा कर लें, अपने सर को ऊपर उठा लें, और थोड़े तेज़ कदमों से आगे की तरफ़ बढे चलें।  आप पाएँगे कि  आपका आत्मविशवास भी बढ़ चूका है। 

     कोशिश करें और परिणाम खुद देखें। 

     4. बोलने की आदत डालें। कई तरह के समूह के साथ काम करते हुए मैंने यह पाया है कि बहुत से समझदार और योग्य लोग चर्चाओं में भाग नही लेते है।  चर्चा के दौरान उनका मुँह ही नही खुल पता।  ऐसा नही है कि उनके पास बाकि लोगों जितने अच्छे विचार नही होते या वे बोल नही सकते।  इसका कारण सिर्फ़ यह होता है कि उनमे आत्मविशवास नहीं होता। 

     5. बड़ी मुस्कराहट दें।  ज्यादा लोगों का कहना है कि मुस्कराहट से उन्हें सच्ची ताक़त मिलती है।  उन्हें बताया गया है कि मुस्कराहट आत्मविशवास की कमी को दूर करने के लिए एक बढ़िया दवा है।  परंतु ज्यादातर लोग इस बात में इसलिए यक़ीन नहीं करते, क्योंकि जब वे डरे होते है तो वे मुस्कराने की कोशिश ही नही करते। 
     यह छोटा-सा पयोग करके देखें।  आप पराजित अनुभव करें और बड़ी मुस्कराहट दे - एक साथ, एक ही समय में यह संभव नही है।  आप ऐसा कर ही नही सकते।  बड़ी मुस्कराहट आपको आत्मविशवास देती है।  बड़ी मुस्कराहट आपका दर भगाती है, चिंता दूर करती है और निराशा हर लेती है। 

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