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4 September 2015

आप वो भी पा सकते है जो आपके भाग्य में नही हैं


     भले हीं आपके भाग्य में कुछ नहीं लिखा हो पर अगर "गुरु की कृपा" आप पर हो जाए तो आप वो भी पा सकते है जो आपके भाग्य में नही हैं।

     आइये मित्रों जो किस्मत में नही लिखा है वो कैसे पाया जा सकता हैं, इसका लोजिक बताता हूँ।
मित्रों एक सत्य घटना हैं।

      काशी नगर के एक धनी सेठ थे, जिनके कोई संतान नही थी। बड़े-बड़े विद्वान् ज्योतिषो से सलाह-मशवरा करने के बाद भी उन्हें कोई लाभ नही मिला। सभी उपायों से निराश होने के बाद सेठजी को किसी ने सलाह दी की आप गोस्वामी जी के पास जाइये वे रोज़ रामायण पढ़ते है तब भगवान "राम" स्वयं कथा सुनने आते हैं। इसलिये उनसे कहना कि भगवान् से पूछे की आपके संतान कब होगी।

     सेठजी गोस्वामी जी के पास जाते है और अपनी समस्या के बारे में भगवान् से बात करने को कहते हैं। कथा समाप्त होने के बाद गोस्वामी जी भगवान से पूछते है, की प्रभु वो सेठजी आये थे, जो अपनी संतान के बारे में पूछ रहे थे। तब भगवान् ने कहा कि गोवास्वामी जी उन्होंने पिछले जन्मों में अपनी संतान को बहुत दुःख दिए हैं इस कारण उनके तो सात जन्मो तक संतान नही लिखी हुई हैं।

     दूसरे दिन गोस्वामी जी, सेठ जी को सारी बात बता देते हैं। सेठ जी मायूस होकर ईश्वर की मर्जी मानकर चले जाते है।

     थोड़े दिनों बाद सेठजी के घर एक संत आते है। और वो भिक्षा मांगते हुए कहते है की भिक्षा दो फिर जो मांगोगे वो मिलेगा। तब सेठजी की पत्नी संत से बोलती हैं कि गुरूजी मेरे संतान नही हैं। तो संत बोले तू एक रोटी देगी तो तेरे एक संतान जरुर होगी। व्यापारी की पत्नी उसे दो रोटी दे देती है। उससे प्रसन्न होकर संत ये कहकर चला जाता है कि जाओ तुम्हारे दो संतान होगी।

     एक वर्ष बाद सेठजी के दो जुड़वाँ संताने हो जाती है। कुछ समय बाद गोस्वामी जी का उधर से निकलना होता हैं। व्यापारी के दोनों बच्चे घर के बाहर खेल रहे होते है। उन्हें देखकर वे व्यापारी से पूछते है की ये बच्चे किसके है। व्यापारी बोलता है गोस्वामी जी ये बच्चे मेरे ही है। आपने तो झूठ बोल दिया की भगवान् ने कहा की मेरे संतान नही होगी, पर ये देखो गोस्वामी जी मेरे दो जुड़वा संताने हुई हैं। गोस्वामी जी ये सुन कर आश्चर्यचकित हो जाते है। फिर व्यापारी उन्हें उस संत के वचन के बारे में बताता हैं। उसकी बात सुनकर गोस्वामी जी चले जाते है।

      शाम को गोस्वामीजी कुछ चितिंत मुद्रा में रामायण पढते हैं, तो भगवान् उनसे पूछते है कि गोस्वामी जी आज क्या बात है? चिन्तित मुद्रा में क्यों हो? तो गोस्वामी जी कहते है की प्रभु आपने मुझे उस व्यापारी के सामने झूठा पटक दिया। आपने तो कहा ना की व्यापारी के सात जन्म तक कोई संतान नही लिखी है फिर उसके दो संताने कैसे हो गई।

      तब भगवान् बोले कि उसके पूर्व जन्म के बुरे कर्मो के कारण में उसे सात जन्म तक संतान नही दे सकता क्योकि में नियमो की मर्यादा में बंधा हूँ। पर अगर.. मेरे किसी भक्त ने उन्हें कह दिया की तुम्हारे संतान होगी, तो उस समय में भी कुछ नही कर सकता गोस्वामी जी। क्योकि में भी मेरे भक्तों की मर्यादा से बंधा हूँ। मै मेरे भक्तो के वचनों को काट नही सकता मुझे मेरे भक्तों की बात रखनी पड़ती हैं। इसलिए गोस्वामी जी अगर आप भी उसे कह देते की जा तेरे संतान हो जायेगी तो मुझे आप जैसे भक्तों के वचनों की रक्षा के लिए भी अपनी मर्यादा को तोड़ कर वो सब कुछ देना पड़ता हैं जो उसके नही लिखा हैं।
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      मित्रों कहानी से तात्पर्य यही हैं कि भले हीं विधाता ने आपके भाग्य में कुछ ना लिखा हो, पर अगर किसी गुरु की आप पर कृपा हो जाये तो आपको वो भी मिल सकता है जो आपके किस्मत में नही।

इसलिए कहते है मित्रों कि...
भाग लिखी मिटे नही, लिखे विधाता लेख
मिल जावे गुरु मेहर तो, लगे लेख पे मेख ।।

     भाग्य में लिखा विधाता का लेख मिट नही सकता। पर किसी पर गुरु की मेहरबानी हो जाए तो विधाता का लेख भी दिवार की मेख पर लटका रह जाता हैं।



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20 June 2015

Electro magnetic field


     दोस्तों जिसे हम लोग आम भाषा में आत्मा, भूत या देव ईत्यादि नामों से जानते हैं वास्तव में वो एक "electro magnetic filed" है, यानी विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र हैं। और इस चुम्बकीय क्षेत्र में हमारे जन्म-जन्मांतरों के डेटा "चुम्बकीय तरंगो" के रूप में रक्षित होते हैं।

     दोस्तों कम्प्यूटर, सी डी या हार्ड डिस्क इत्यादि में रक्षित सभी डेटा मूल रूप में "electro magnetic filed" के रूप में ही रक्षित होते हैं। और सीडी या हार्ड डिस्क ईत्यादी घटक तो मात्र इन चुम्बकीय तरंगो को सुरक्षित रखने का साधन मात्र होते हैं। बाकी ये सभी डेटा कम्प्यूटर ईत्यादि के माध्यम से "चुम्बकीय तरंगो" के रूप में ब्रम्हांड में ही रक्षित होते हैं। बिना कम्प्यूटर इत्यादि के सहयोग के बिना इनका निर्माण नही हो सकता।

     बिल्कुल ठीक ऐसे ही हमारी आत्मा रुपी ऊर्जा के कण पर जन्म-जन्मान्तर के हमारे विचारों, भावों और कर्मो के डेटा रिकॉर्ड होते हैं। जब हम जन्म लेते हैं तब आत्मा के साथ ये रिकॉर्डेड डेटा शरीर के विकास के साथ न्यूरोन्स द्वारा रीड होकर शरीर रूपी कम्प्यूटर के साथ रन होने लगते हैं। जन्म-जन्मांतरों से रक्षित ये डेटा एक प्रोग्राम के रूप में हमारे स्वभाव के साथ सक्रीय हो जाते हैं। और उन्हीं रिकॉर्डेड प्रोग्राम के चलते हमारा स्वभाव चुनाव प्रक्रिया द्वारा कर्मो का चुनाव कर अच्छे-बुरे परिणामों की यात्रा करता हैं। और इसके साथ-साथ हमारा कम्युटर सिस्टम इस जन्म के भावों, विचारों और कर्मो को निरंतर अपनी मैमोरी में "electro magnetic filed"  के रूप में निरंतर रिकॉर्ड करता रहता हैं। 

     एक बात ध्यान रखे की जैसे हार्ड डिस्क ईत्यादि में डेटा को रक्षित करने के लिये कंप्यूटर इत्यादि घटक की आवश्यकता होती हैं ठीक वैसे ही हमारी आत्मा पर रक्षित ये डेटा भी बिना शरीर के ना तो रिकॉर्ड हो सकते हैं और ना ही रन हो सकते हैं। इसलिए अक्सर हम कथाओं में सुनते हैं की देवता लोग भी ये मनुष्य शरीर पाने हेतू लालायित रहते हैं। क्योकि बिना शरीर के देवता भी कुछ नही कर सकते और ना ही प्रेत कुछ कर सकते हैं।

     अक्सर हम जब किसी शरीर में देव या प्रेत ईत्यादि की उपस्थिति देखते हैं तब व्यक्ति के शरीर की हरकते बदल जाती हैं। उसकी आवाज इत्यादि भी बदल जाती हैं। मित्रों आत्मा, प्रेत या देव ईत्यादि के "electro magnetic filed" किसी शरीर में प्रवेश नही करते बल्कि हमारे मस्तिष्क के न्यूरोन्स इनके द्वारा भेजे गये चुम्बकीय सन्देशों को रीड कर प्रतिक्रिया शुरू कर देते हैं। जैसे एक सीडी में लतामंगेशकर के गाने हैं तो क्या सीडी पड़े-पड़े बोल उठेगी ? नही ना... उसके लिए हमे कम्प्यूटर या सीडी प्लेयर ईत्यादि की जरुरत होगी। सीडी में रक्षित डेटा का सम्पर्क कम्प्यूटर ईत्यादि से होने पर ही लता मंगेशकर की आवाज में गाने बजने शुरू होंगे। बस ठीक इसी तरह हमारे मष्तिष्क के न्यूरोन्स ऐसे ही किसी Magnetic Field ke संपर्क में आने पर वैसी ही प्रतिक्रिया देंगे।

     दोस्तों सारा का सारा संसार इन्ही तरंगो के रहस्यों से भरा पड़ा हैं। जो मैंने आपको बताया हैं वैसा आपने कही नही पढ़ा होगा। क्योंकि ये शोध बिलकुल नई हैं जिस पर विशवास कर मान लेना अभी फिलहाल नामुनकिन हैं। पर मित्रों इन पर बहुत शोध चल रहा हैं और आने वाले सौं वर्षों में इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ी क्रांति देखी जा सकती हैं। आजतक हम जो सुन रहे हैं और पढ़ रहे हैं वो  धर्म और धार्मिक ग्रंथों की सीमा के दायरे में सिमित हैं। पर इस फिलोसोफी तक पहुँचने के लिए आपको धर्म की सीमाओं से ऊपर उठना होगा।
लिखने को और बताने को बहुत कुछ हैं पर समय का अभाव हैं दोस्तों। जब भी समय मिलेगा तब इस विषय पर और चर्चा करेंगे।

     मेरे विचार और सोच लीक से हटकर हैं। और मैं जानता हूँ की वर्तमान परिपेक्ष में इन तथ्यों को स्वीकारा जाना नामुनकिन हैं। क्योकि भविष्य की बातों को वर्तमान में स्वीकार करना कठिन हैं। ये विचार मेरे स्वतंत्र विचार हैं, मैं किसी पर अपने विचार थोप नही रहा हूँ। किसी को इसमें रूचि हैं तो स्वयं शोध करें। ध्यान के माध्यम से ब्रम्हांड की इन सूक्ष्मताओं से संपर्क किया जा सकता हैं। ध्यान के सहारे जब आप की ऊर्जा सहस्त्रार तक पहुँचती हैं तो आपके मष्तिष्क में चींटिया सी रेंगने लगती हैं। विज्ञान की भाषा में आपके न्यूरोन्स को अत्यधिक ऊर्जा मिलती हैं जिसके चलते आपके न्यूरोन्स की सेन्सेटिविटी बढ़ जाती हैं। और इसी के चलते आपकी चुंबकीय तरंगे ब्रम्हाण्डीय रहस्यों को खोजने में कामयाब हो जाती हैं।

              Astrologer & Philopher
                    Gopal Arora
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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22 April 2015

इन चार उपायों से बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित करें


यहाँ चार तरीक़े दिए जा रहे है, जिनकी मदत से आप बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित कर सकते है। 

     1. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बड़े, सकारात्मक, आशावादी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें।  जब कोई आपसे पूछता है, "आप आज कैसा महसूस कर रहे है?" और आप उसे जवाब देते है, "मै थका हुआ हुँ ( मुझे सिरदर्द है, काश कि आज शनिवार होता, मेरा आज बहुत बुरा हाल है )" तो आप अपनी स्थिति को अपने ही हाथों ख़राब कर रहे है।  इसका अभ्यास करें :- यह एक बहुत आसान बात है, परंतु इसमें बहुत शक्ति है।  जब भी कोई आपसे पूछे, "आप कैसे है ?" या "आप आज कैसा महसूस कर रहे है ?" तो जवाब में हमेशा कहें, "बहुत बढ़िया! धन्यवाद और आप कैसे है ?"  या कहे "बेहतरीन" या "शानदार"।  हर मौक़े पर कहें कि आप बढ़िया महसूस कर रहे है और आप सचमुच बढ़िया महसूस करने लगेंगे और ज्यादा बड़ा भी।  एक ऐसे व्यक्ति बनें जो हमेशा बढ़िया महसूस करता है।  इससे दोस्त बनते है। 

     2. दूसरे लोगों का वर्णन करते समय चमकीले, खुशनुमा, सकारात्मक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें।  यह नियम बना लें कि आप अपने सभी दोस्तों और सहयोगियों के लिए बड़े, सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करेंगे।  जब आप किसी के साथ किसी तीसरे अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हो, तो आप उसकी बड़े शब्दों में प्रशंसा करे, "हाँ, वह बढ़िया आदमी है।"  "लोग कहते है उसका काम बहुत बढ़िया है।"  इस बात का बहुत ध्यान रखें कि आप उसकी बुराई न करें या घटिया भाषा का इस्तेमाल न करें।  देर सबेर तीसरे व्यक्ति को पता चल जाता है कि आपने क्या कहा था, और आपने जो बुराई की थी, वह आपको ही बुरा बना सकती है। 

     3. दूसरों का उत्साह बढ़ाने के लिए सकारात्मक भाषा का प्रयोग करें।  हर मौक़े पर लोगों की तारीफ़ करें।  अपनी पत्नी या पति की हर रोज़ तारीफ़ करें।  अपने साथ काम करने वालों की रोज़ तारीफ़ करें।  अगर सच्ची तारीफ़ की जाए, तो यह सफ़लता का औज़ार बन जाती है।  इसका प्रयोग करे! इसका प्रयोग बार-बार, हर बात करें।  लोगों के हुलिए, उनके काम, उनकी उपलब्धियों, उनके परिवार की तारीफ़ करें। 

     4. दूसरों के सामने योजना प्रस्तुत करते समय सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें।  जब लोग इस तरह की बात सुनते है - "मै आपको एक अच्छी खबर सुनाना चाहता हुँ।  हमारे सामने एक सुनहरा अवसर है..." तो उनके दिमाग़ में आशा जाग जाती है।  परंतु जब वे इस तरह की कोई बात सुनते है, "चाहे आप इसे पसंद करें या न करें, हमें यह काम करना है,"  तो दिमाग़ की बोझिल, बोअरिंग हो जाती वे भी इसी तरह के हो जाते है।  जीत का वादा करें और उनकी आँखों में चमक आ जाएगी।  जीत का वादा करें और आपको समर्थन हासिल हो जाएगा।  महल बनाएं, क़ब्र न खोदें!  

15 April 2015

अपने सच्चे आकार को नापें और जानें कि आप कितने योग्य है


     अब अगर इतने सरे लोगों की सोंच इतनी छोटी है, तो इसका मतलब यह हुआ कि अगर आप सचमुच बड़ा सोचते है तो आपके सामने बहुत कम प्रतियोगिता है और आपके लिए एक बहुत बड़े करियर का रास्ता खुला है। 

     सफलता के मामले में लोगों को इंच या पौंड के हिसाब से नही नापा जाता, न ही उन्हें कॉलेज की डिग्री यों से या पारिवारिक पृष्ठ भूमि के पैमाने से नापा जाता है, उन्हें तो उनकी सोच के आकार से नापा जाता है।  आप कितना बड़ा सोंचते है, यही आपकी उपलब्धियों के आकार को तय करता है।  देखते है कि हम किस तरह अपनी सोच को बड़ा कर सकते है। 

     कभी आपने खुद से पूछकर देखा है, "मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है ?"  शायद इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी खुद का मूल्यांकन कम करने की होती है - यानि की खुद को सस्ते में बेचने की कमजोरी।  आत्म-मूल्यांकन में कमी अनगिनत तरीकों से साफ़ दिखती है।  जॉन अख़बार में एक नौकरी का विज्ञापन देखता है।  वह इसी तरह की नौकरी करना चाहता है।  परंतु वह इसके लिए कोई कोशिश नही करता क्योंकि वह सोचता है, "मै इस नौकरी के लिए पर्याप्त योग्य नहीं हूँ, इसलिए कोशिश करने की मेहनत क्यों करुँ ?"  या जिम जोन के साथ डेटिंग पर जाना चाहता है, परंतु वह उससे नहीं पूछता क्योंकि उसे लगता है कि वह तैयार नही होगी। 

     टॉम को लगता है कि मिस्टर रिचर्ड्स उसके माल के अच्छे ग्राहक हो सकते है, परंतु टॉम मिस्टर रिचर्ड्स जैसे बड़े आदमी उससे नहीं मिलेंगे।  पीट नौकरी का आवेदन भर रहा है।  उसमे एक प्रशन पूछा जाता है, "आप शुरुवात में कितनी तनख़्वाह चाहेंगे?"  पीट एक छोटी-सी रक़म लिख देता है क्योंकि उसे लगता है कि वह इससे ज्यादा तनख़्वाह के योग्य नही है, जबकि वह इससे ज्यादा तनख़्वाह पाना चाहता है। 

     हज़ारों सालों से दार्शनिक हम यह अच्छी सलाह देते आ रहे है - खुद को जाने।  परंतु ज्यादातर लोग इस सलाह का मतलब यह निकालते है कि खुद को नकारात्मक पहलू को जाने।  ज्यादातर आत्म-मूल्यांकनों में लोग अपनी गलतियों, कमियों, अयोग्यताओं की लंबी सी मानसिक सूची बना लेते है। 

     हमें अपनी कमियाँ पता हो, अच्छी बात है।  इनसे हमें यह पता चलता है कि हमें इन क्षेत्र में सुधार करना है।  परंतु अगर हम सिर्फ़ अपने नकारात्मक पहलू को ही जान पाए तो हम परेशानी में फँस जाएँगे।  हमारा मूल्य अपनी नज़रों में कम हो जाएगा। 

     यह एक अभ्यास दिया गया है जिससे आप अपने सच्चे आकार को नाप सकते है।  मैंने इसे एक्जीक्यूटिव्ज और सेल्स पर्सनल्स के अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आज़ माया है।  यह वाक़ई काम करता है। 

     1. अपने पाँच प्रमुख गुणों को तय करें।  किसी निष्पक्ष दोस्त की मदत लें - जैसे आपकी पत्नी, आपका सीनियर, आपका प्रोफ़ेसर - कोई समझदार व्यक्ति जो आपको सच्ची राय दे सके।  ( गुणों के उदाहरण है शिक्षा, अनुभव, तकनीकी योग्यता, हुलिया, संतुलन घरेलू जीवन, रवैया, व्यक्तित्व, लीडरशिप की योग्यता )।

     2. हर गुण के सामने अपने उन तीन परिचित व्यक्तियों के नाम लिख लें हो बेहद सफ़ल है परंतु उनमें यह गुण उतनी मात्र में नही है, जितनी मात्र में यह आपमें है।
     इस अभ्यास को पूरा कर लेने पर आप पाएँगे कि आप किसी न किसी बात में कई सफ़ल लोगों से आगे है।

     ईमानदारी से आप एक ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते है - आप जितना सोचते है, आप उससे बड़े है।  इसलिए, आप अपनी सोच को भी अपने साली आकार के हिसाब से बना लें।  उतना ही बड़ा सोचें जितने बड़े आप है! और कभी, खुद को सस्ते में न बेचें!

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11 April 2015

विशवासपूर्ण काम करके विशवासपूर्ण सोंच विकसित करें


      यहाँ एक मनो वैज्ञानिक सिद्धांत दिया जा रहा है जो 25 बार पढ़ने लायक है।  इसे तब तक पढ़ते रहे, जब तक कि यह आपके दिमाग़ में पूरी तरह से न घुस जाए :- विशवास पूर्ण चिंतन के लिए विशवास पूर्ण काम करें। 

     महान वैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज. क्रेन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अप्लाइड साइकलॉजी ( शिकागो :- हॉप किन्स सिंडिकेट, इन्क 1950 )  में लिखा है, "याद रखें, काम ही भावनाओं के अग्रज होते है।  हम अपनी भावनाओं को तो सीधे नियंत्रित नहीं कर सकते।  परंतु हम अपने कामों को नियंत्रित करके अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकते है।  वैवाहिक समस्याओं और ग़लत फहमियो को दूर करने के लिए सच्चे मनो वैज्ञानिक तथ्यों को जानें।  हर दिन सही काम करें और जल्दी ही आप में सही भावनाएँ जाग जाएगी!

     मनो वैज्ञानिक के अनुसार शारीरिक गतिविधियों में बदलाव करके हम अपने रवैए को बदल सकते है।  उदाहरण के तौर पर, आप अगर मुस्कराने की क्रिया करते है, तो आप सचमुच मुस्कराने के मूड में आ जाएंगे।  जब आप अपने शरीर को झुकाने के बजाय तान लेते है तो आप ज्यादा सुपीरियर महसूस करने लगते है।  इसके उलट अगर, त्यौरियां चढ़ाकर देखें तो पाएँगे कि आप त्यौरियां चढ़ाने के मूड़ में आ गए है। 

     यह सिद्ध करना तो आसान है कि अपनी क्रियाओं पर काबू करके आप अपनी भावनाओं को बदल सकते है।  जो लोग अपना परिचय देने में संकोच करते है, वे अपने संकोच को आत्म विशवास में बदल सकते है अगर वे सिर्फ कुछ सामान्य क्रियाएँ करे - पहली बात तो यह कि सामने वाले से गर्मजोशी से हाथ मिलाए।  इसके बाद, सामने वाले व्यक्ति की तरफ एकल सीधे देखें।  और तीसरी बात, सामने वाले से कहें, "मुझे आपसे मिलकर ख़ुशी हुई।"

     इन तीन साधारण क्रियाओं से आपका संकोच अपने आप और तत्काल दूर हो जाएगा।  आत्म विशवास से भरी क्रिया की वजह से आप में अपने आप आत्म विशवास आ जाएगा। 

     आत्मविशवासपूर्ण चिंतन करने के लिए आत्मविशवास की क्रियाएँ करें।  जिस तरह की भावनाएँ आप स्वयं में जगाना चाहते है, उस तरह के काम करें।  नीचे आत्मविशवास बढ़ाने के लिए पॉँच अभ्यास दिए है।  इन्हें ध्यान से पढ़े।  फिर इनका अभ्यास करने की पूरी कोशिश करें और आप अपना आत्मविशवास काफ़ी बढ़ा-चढ़ा पाएँगे। 

     1. आगे की बेंच पर बैठे।  कभी आपने मीटिंग या चर्च या क्लास रूम या किसी और तरह की सभा में इस बात पर गौर किया की पीछे की सीटें सबसे पहले भर जाती है ? ज्यादातर लोग पीछे की लाइन में इसलिए बैठते है ताकि वे "लोगों की नज़रों में न आए"।  और वे लोगों की नज़रों में आने से इसलिए बचना चाहते है क्योंकि उनमें आत्मविशवास नहीं आता। 

     2. नज़रें मिलाकर बात करने का अभ्यास करें।  कोई व्यक्ति किस तरह अपनी आँखों का प्रयोग करता है, इससे भी हमें उसके बारे में काफ़ी जानकारी मिल सकती है।  अगर कोई आपकी आँखों में सीधे नहीं देखता है, तो आपके मन में यह सवाल तत्काल आ जाता है, "यह व्यक्ति क्या छुपाने की कोशिश कर रहा है ? यह व्यक्ति किस बात से डरा हुआ है ? क्या यह मुझे धोका देना चाहता है ? इस व्यक्ति के इरादे क्या है ?"

     3. 25% तेज़ चले।  आत्मविशवास बढ़ाने के लिए 25% तेज़ चलने की तकनीक का प्रयोग करके देखें।  अपने कंधो को सीधा कर लें, अपने सर को ऊपर उठा लें, और थोड़े तेज़ कदमों से आगे की तरफ़ बढे चलें।  आप पाएँगे कि  आपका आत्मविशवास भी बढ़ चूका है। 

     कोशिश करें और परिणाम खुद देखें। 

     4. बोलने की आदत डालें। कई तरह के समूह के साथ काम करते हुए मैंने यह पाया है कि बहुत से समझदार और योग्य लोग चर्चाओं में भाग नही लेते है।  चर्चा के दौरान उनका मुँह ही नही खुल पता।  ऐसा नही है कि उनके पास बाकि लोगों जितने अच्छे विचार नही होते या वे बोल नही सकते।  इसका कारण सिर्फ़ यह होता है कि उनमे आत्मविशवास नहीं होता। 

     5. बड़ी मुस्कराहट दें।  ज्यादा लोगों का कहना है कि मुस्कराहट से उन्हें सच्ची ताक़त मिलती है।  उन्हें बताया गया है कि मुस्कराहट आत्मविशवास की कमी को दूर करने के लिए एक बढ़िया दवा है।  परंतु ज्यादातर लोग इस बात में इसलिए यक़ीन नहीं करते, क्योंकि जब वे डरे होते है तो वे मुस्कराने की कोशिश ही नही करते। 
     यह छोटा-सा पयोग करके देखें।  आप पराजित अनुभव करें और बड़ी मुस्कराहट दे - एक साथ, एक ही समय में यह संभव नही है।  आप ऐसा कर ही नही सकते।  बड़ी मुस्कराहट आपको आत्मविशवास देती है।  बड़ी मुस्कराहट आपका दर भगाती है, चिंता दूर करती है और निराशा हर लेती है। 

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10 April 2015

अपनी अंतरात्मा के हिसाब से काम करके आत्म-विशवास बढ़ाएँ


     हम में से हर एक व्यक्ति में सही होने, सही सोचने और सही काम करने की इच्छा होती है।  जब हम इस इच्छा के विपरीत व्यवहार करते है तो हम अपनी अंतरात्मा में कैंसर की बीमारी आमंत्रित कर लेते है।  यह कैंसर बढ़ता है और हमारे आत्म विशवास को कम करता जाता है।  इसलिए इस तरह कोई काम न करें, जिसे करने के बाद आपको यह दर सताने लगे, "क्या मै पकड़ा जाऊँगा ? क्या लोगों को इस बात का पता चल जाएगा ? क्या मै बचने में सफ़ल हो पाउँगा ?"

     धोखा देकर और अपना आत्मविशवास कम करके "अच्छे नंबर" लाने की यानी कि सफ़ल होने की कोशिश कभी न करें। 

     मुझे यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि पॉल को सीख मिल गयी।  उसने सही काम करने का व्यावहारिक मूल्य समझ लिया।  मैंने सुझाव दिया कि वह बैठ जाए और एक बार फिर परीक्षा दे।  उसने मुझसे सवाल किया, "परंतु क्या आप मुझे कॉलेज से नहीं निकालेंगे ?"  मेरा जवाब था, "मै निष्कासन के नियम जनता हूँ।  परंतु, अगर हम धोखा देने वाले सारे विद्यार्थियों को कॉलेज से निकाल देंगे तो हमारे आधे प्रोफेसरों की छुट्टी हो जाएगी।  और अगर हम धोखा देने का विचार करने वाले सभी विद्यार्थियों को निकाल देंगे, तो हमें कॉलेज में ताले लगाने पड़ेंगे।"

     "इसलिए मै घटना को भूलने के लिए तैयार हू, अगर तुम एक काम करो।"

     "बिलकुल," उसने कहा। 

     मै उसे एक पुस्तक दी।  पुस्तक का नाम था fifty years with the golden rule. इसे देते हुए मैंने उससे कहा, "पॉल, इस पुस्तक को पढ़ो और बढ़ने के बाद इसे वापस कर देना।  जे. सी. पेनी के खुद के शब्दों में यह जाने कि किस तरह सही काम करने की वजह से वे अमेरिका के सबसे अमीर व्यक्तियों के समूह में शामिल हो गए।" 

     सही काम करने से आपकी अंतरात्मा संतुष्ट रहती है।  और इससे आत्मविशवास भी बढ़ता है।  जब हम कोई गलत काम करते है, तो दो नकारात्मक बातें होती है।  पहली बात तो यह कि हम में अपराध बोध आ जाता है और इस अपराध बोध से हमारा आत्मविशवास कम हो जाता है।  दूसरी बात यह कि देर-सबेर दूसरे लोगों को हमारे ग़लत काम की जानकारी मिल जाती है और उनका हम पर से विशवास उठ जाता है। 

     सही काम करें और अपने आत्मविशवास को बनाए रखें।  यही चिंतन का कारगर तरीक़ा है। 

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9 April 2015

सेहत के बहानासाइटिस को हराने के चार सकारात्मक क़दमों का परयोग करें


सेहत के बहानासाइटिस के बचाव के सर्वश्रेष्ठ वैक्सीन के चार डोज़ है :-

     1. अपनी सेहत के बारे में बात न करें।  आप किसी बीमारी के बारे में जितनी ज्यादा बात करेंगे, चाहे वह साधारण सी सर्दी ही क्यों न हो, वह बीमारी उतनी ही बिगड़ती जाएगी।  बुरी सेहत के बारे में बाते करना काँटों को खाद-पानी देने की तरह है।  इसके अलावा, अपनी सेहत के बारे में बातें करते रहना एक बुरी आदत है।  इससे लोग बोर हो जाते है।  इससे आपको आत्म-केंद्रित और बुढ़िया की तरह बातें करने वाला समझा जा सकता है।  सफ़लता की चाह रखने वाले आदमी अपनी "बुरी" सेहत के बारे में चिंता नही करता।  अपनी बीमारी का रोना रोने से आपको थोड़ी सहानुभूति तो मिल सकती है, परन्तु जो आदमी हमेशा शिकायत करता रहता है, उसे कभी किसी का सम्मान, आदर या वफ़ादारी नहीं मिल सकते। 

     2. अपनी सेहत के बारे में फालतू की चिंता करना छोड़ दे।  डॉ. वॉल्टर अल्वरेज़ विश्वप्रसिद्ध मेयो क्लीनिक में एमेरिटस कंसल्टेंट है।  उन्होंने हाल ही में लिखा है, "मै हमेशा फ़िजूल की चिंता करने वाले लोगों को ऐसा न करने की सलाह देता हूँ।  उदाहरण के तौर पर, मैंने एक आदमी को देखा जिसे इस बात का पूरा विशवास था कि उसका 'गाल ब्लैडर' ख़राब है, हालाँकि आठ बार अलग़-अलग क्लीनिकों में एक्स-रे कराने पर भी उसका गाल ब्लैडर पूरी तरह सही दिख रहा था और डॉक्टरों का कहना था कि यह सिर्फ़ उसके मन का वहम है और दरअसल उसे कोई बीमारी नहीं है।  मैंने उससे विनंती की वह अब तो मेहरबानी करके अपने गाल ब्लैडर का एक्स-रे कराना छोड़ दे।  मैंने सेहत का जरूरत से ज्यादा ध्यान रखने वाले सैकड़ो लोगों को बार-बार जबरन ई.सी.जी. कराते देखा है और मैंने उनसे भी यही विनंती की है कि वे अपनी बीमारी के बारे में फ़ालतू की चिंता करना छोड़ दें। 

     3. आपकी सेहत जैसी भी हो, आपको उसके लिए कृतज्ञ होना चाहिए।  एक पुरानी कहावत है, "मै अपने फटे हुए जूतों को लेकर दुःखी हो रहा था, परंतु जब मैंने बिना पैरों वाले आदमी को देखा तो मुझे ऊपर वाले से कोई शिकायत नहीं रही, इसके बजाय मै कृतज्ञ हो चला।"  इस बात पर शिकायत करने के बजाय कि आपकी सेहत में क्या "अच्छा नहीं" है, आपको इस बारे में खुश और कृतज्ञ होना चाहिए कि आपकी सेहत में क्या 'अच्छा' है।  अगर आप कृतज्ञ होंगे तो आप कई असली बीमारियों से भी बचे रहेंगे। 

     4. अपने आपको यह अक्सर याद दिलाए, "जंग लगने से बेहतर है घिस जाना।"  आपको जीवन मिला है आनंद लेने के लिए।  इसे बर्बाद न करें।  जिंदगी जीने के बजाय अगर आप चिंता करते रहेंगे, तो आप जल्दी ही किसी अस्पताल में भर्ती नज़र आएँगे। 

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8 April 2015

विशवास की शक्ती को विकसित करें


विशवास की शक्ति को प्राप्त करने और विशवास को दृढ़ बनाने के लिए तीन उपाय किए जा सकते है। 

     1.  सफ़लता की बात सोचें, असफ़लता की बात न सोचें।  नौकरी में, घर में, असफ़लता की जगह सफ़लता के बारे में सोचें।  जब आपके सामने कोई कठीन परिस्थिति आए, तो सोचें "मै जीत जाऊँगा," यह न सोचें "शायद मै हार जाऊँगा।"  जब आप किसी से प्रतियोगिता करें, तो सोचें, "मै उसके जितना योग्य नहीं हू।"  जब अवसर नज़र आए, तो सोचें "मै यह कर सकता हू," यह न सोचें "मै इसे नही कर सकता।"  अपनी चिंतन प्रक्रिया पर इस विचार को हावी हो जाने दें, "मै सफ़ल होकर दिखाऊँगा।"  सफ़लता के बारे में सोचने से आपका दिमाग़ ऐसी योजना बना लेता है जिससे आपको सफ़लता मिलती है।  असफ़लता के बारे में चिंतन करने से आपका दिमाग़ ऐसे विचार सोचता है, जिन से आपको असफ़लता हाथ लगती है। 

     2.  अपने आपको बार-बार याद दिलाए कि आप जितना समझते है, आप उससे कहीं बेहतर है।  सफ़ल लोग सुपरमैन नही होते।  सफ़लता के लिए सुपर-इंटेलेक्ट का होना जरूरी नही है।  न ही सफ़लता के लिए किसी जादुई शक्ति या रहस्य मयी तत्व की आवश्यकता होती है।  और सफलता का भाग्य से भी कोई संबंध नहीं होता।  सफ़ल लोग साधारण लोग ही होते है, पर ऐसे लोग होते है जिन्हें अपने आप पर विशवास है, अपनी क्षमताओं पर विशवास है और जो मानते है कि वे सफल हो सकते है।  कभी भी, हाँ, कभी भी, खुद को सस्ते में न बेचें। 

     3.  बड़ी सोंच में विशवास करें।  आपकी सफ़लता का आकार कितना बड़ा होगा, यह आपके विशवास के आकार से तय होगा।  अगर आपके लक्ष्य छोटे होंगे, तो आपकी उपलब्धिया भी छोटी होंगी।  अगर आपके लक्ष्य बड़े होंगे, तो आपकी सफलता भी बड़ी होगी।  एक बात कभी न भूले! बड़े विचार और बड़ी योजनाएं अक्सर छोटे विचारों और छोटी योजनाओं से आसान होते है। 

     जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी के चेयरमैन राल्फ जे. कॉर्डिनेर ने लीडरशिप कॉन्फ्रेंस में कहा था, "… जो भी लीडर बनना चाहता है, उसे स्वयं के स्वयं की कंपनी के विकास की योजना बना लेनी चाहिए और इसका दॄढ़ निष्चय कर लेना चाहिए।  कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति के विकास का आदेश नहीं दे सकता, कोई व्यक्ति दौड़ में आगे रहेगा या पीछे रह जाएगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी तैयारी कैसी है।  यह ऐसी चीज़ है जिस में समय लगता है, मेहनत लगती है और इस में त्याग की आवश्यकता होती है।  आपके लिए यह कोई दूसरा नहीं कर सकता।"

     मिस्टर सार्डिनेर की सलाह में दम है और यह व्यावहारिक है।  इस पर चलें।  जो लोग बिज़नेस मैनेजमेंट, सेल्स लाइन, इंजीनिरिंग, धार्मिक संस्थाओं, लेखन, अभिनय और दूसरे क्षेत्रों में चोटी पर पहुँचते है वे निष्ठा और लगन के साथ आत्म-विकास की योजना पर चलकर ही वहाँ पहुँच पाए है। 

     किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम में - और यही इस वेबसाइट का लक्ष्य भी है - तिने बातें होनी चाहिए।  इसमें सामग्री होनी चाहिए - यानी क्या किया जाए।  दूसरी बात यह कि इसमें तरीक़ा होना चाहिए - यानी कैसे किया जाए।  और तीसरी बात यह की इसे एसिड टेस्ट में खरा उतरना चाहिए - यानी कि इससे परिणाम मिलना चाहिए।      

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12 March 2015

आप जीतने बड़े हो, अपने आपको उतना ही बड़ा मानें


     किसी व्यक्ति की शब्दावली का महत्त्वपूर्ण पैमाना उसके शब्दों की संख्या या आकर नहीं है।  असली महत्त्व की बात तो यह है कि उसके शब्दों का उस पर और सामने वाले पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। 

     यहाँ एक मुलभुत बात बताई जा रही है - हम शब्दों और वाक्यों में नहीं सोंचते है।  हम तस्वीरों और बिंबों में सोचते है।  शब्द विचारों के लिए कच्चा माल है।  जब इन्हें बोला जाता है या पढ़ा जाता है तो हमारा दिमाग़ी कंप्यूटर इन शब्दों को अपने आप तस्वीरों में बदल लेता है।  हर शब्द, हर वाक्य, आपके दिमाग़ में अलग़ तस्वीर बनाता है।  अगर कोई यह कहता है, "जिम ने एक नया स्पलिट-लेवल ख़रीदा है," तो हमारे दिमाग़ में एक अलग तस्वीर बनती है।  परन्तु अगर आपको बताया जाता है, "जिम ने एक रैंच हाउस ख़रीदा है" तो आपके दिमाग में दूसरी ही तस्वीर बनती है।  हमारे दिमाग़ में अलग़-अलग़ तस्वीरें अलग़-अलग शब्दों की वज़ह से बनती है। 

     इसे इस तरीक़े से देखें।  जब आप बोलते है या लिखते है तो आप एक तरह से दूसरे लोगों के दिमाग़ में फिल्में दिखने वाले प्रोजेक्टर का काम कर रहे है।  और आप जिस तरह की फ़िल्म दिखाएँगे, सामने वाले पर आपका प्रभाव वैसा ही पड़ेगा। 

     मान लीजिए आप लोगों को यह बताते है, "मुझे यह बताते हुए दुःख हो रहा है कि हम असफ़ल हो गए है।"  इस वाक्य का उन लोगों पर क्या असर होगा? वे लोग इन शब्दों में हार और निशाना और दुःख के चित्र देखेंगे, जो "असफ़ल" शब्द में छुपे हुए है।  इसके बजाय अगर आप कहते है, "यह रहा एक नया उपाय, जिसमे हम असफ़ल हो सकते है," तो इससे उनका उत्साह बढ़ जाएगा और वे एक बार फिर कोशिश करने के लिए तैयार हो जाएँगे। 

     मान लीजिए आप कहते है, "हमारे सामने एक समस्या है।"  ऐसा कहने पर दूसरों के दिमाग़ में आप एक ऐसी तस्वीर बना देंगे जो सुलझाने में मुश्किल और अप्रिय होगी।  इसके बजाय यह कहे, "हमारे सामने एक चुनौती है।"  और इस वाक्य से आप एक ऐसी मानसिक तस्वीर बना देते है जिसमें आनंद है, खेल, करने के लिए कुछ अच्छा है। 

     या किसी समूह से कहे, "हमने काफ़ी बड़ा खर्च कर डाला।"  और लोगों को लगता है कि ख़र्च हुआ पैसा कभी वापस नहीं लौटेगा।  निष्चित रूप से यह नकारात्मक वाक्य है।  इसके बजाय यह कहे, "हमने काफ़ी बड़ा निवेश किया है," और लोग एक ऐसी तस्वीर बना लेंगे जिसमें बाद में लाभ लौटता हुआ दिखता है, और यह एक बहुत सुखद दॄश्य होता है।

     मुददे की बात यह है -  बड़े चिंतको में अपने और दूसरों के मस्तिष्क में सकारात्मक, प्रगतिशील और आशावादी तस्वीरें बनाने की कला होती है।  बड़ी सोच के लिए हमें ऐसे शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए जो बड़े, सकारात्मक मानसिक चित्र प्रदान कर सके। 

     पढ़ते समय खुद से पूछे, "मै किस तरह के मानसिक चित्र देख रहा हु ?"
नकारात्मक विचार -
1. इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा, हम कर चुके है। 

2. मैंने पहले भी यह बिज़नेस किया था और मै इसमें असफ़ल हो गया था।  मै अब दुबारा भूलकर भी कोशिश नहीं करूँगा। 

3. मैंने कोशिश करके देखा है, परन्तु यह माल बिकता ही नही है।  लोग इसे नही खरीदना चाहते। 

4. बाज़ार माल से अटा पड़ा है।  सोचिए, ७५% संभावित माल तो पहले ही बिक चूका है।  बेहतर है कि इससे बाहर निकल आऊ। 

5. उनके आर्डर छोटे होते है।  मै अब उनके पास नही जाऊँगा।
 सकारात्मक विचार -
1. हम अभी हारे नहीं है।  हम कोशिश करते रहेंगे।  यह रहा एक नया उपाय जिससे हम सफल हो सकते है। 

2. मै एक बार इसमें जरूर असफ़ल हुआ था, परंतु उसमे गलती मेरी ही थी अब मै एक बार फीर कोशिश करके देखूँगा और उस गलती को नही दोहराऊँगा।

3. अब तक मै यह माल नही बेच पाया हु।  परन्तु मै जानता हु कि यह अच्छा है और मै ऐसा फार्मूला ढूँढ ही लूंगा जिससे यह धड़ाधड़ बिकने लगे। 

4. सोचिए, २५% बाज़ार तो खुला पड़ा है।  मै बिलकुल कोशिश करूँगा।  यह बहुत बड़ा अवसर है।  

5. उनके आर्डर अब तक छोटे है।  मै ऐसी योजना बनाता हु जिसमे वे मुझसे और ज्यादा माल खरीदें। 


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